हिमालय की तराई में स्थित कुशीनगर, शांत वातावरण से घिरा एक खूबसूरत ऐतिहासिक स्थल है। जो पूर्ण रूप से भारत में विचार क्रांति के जनक, भगवान बुद्ध को समर्पित है।कुशीनगर मुख्यत: बौद्ध तीर्थ के रूप में जाना जाता हैं, इसलिए यह स्थल, बौद्ध धर्म में आस्था रखने वाले साधकों का मुख्य केंद्र है।

देखने में यह एक छोटा सा कस्बा लगता है, पर यहां अपार आंतरिक शांति का अनुभव होता है। यहां की हवाओं में निहित शीतलता, मानसिक शांति की कुंजी प्रतीत होती है। आइए जानते हैं, धार्मिक पर्यटन के लिहाज से कुशीनगर आपके लिए कितना महत्व रखता है।

एक गौरवशाली इतिहास

उत्तर प्रदेश स्थित इस खूबसूरत स्थल का इतिहास काफी प्राचीन व गौरवशाली माना जाता है। जिसकी खोज एक ब्रिटिश पुरातत्त्ववेत्ता ‘कनिंघम’ ने की थी । जब इस ऐतिहासिक स्थल की खुदाई की गई, तो यहां भगवान बुद्ध की एक विशाल लेटी हुई मूर्ति मिली। पौराणिक ग्रंथों की मानें, तो यह स्थान त्रेता युग से संबंध रखता है, जिसे भगवान राम के पुत्र ‘कुश’ की राजधानी कहा गया। ‘कुश’ से संबंध रखने पर, इस स्थल का नाम ‘कुशावती’ पड़ा।इसके अलावा यहां माथा कुंवर मंदिर और रामाभार स्तूप भी मिले।

जगह जहाँ आप घूम सकते है :

माथा कुँवर मंदिर

महापरिनिर्वाण मंदिर से कुछ दूर आगे माथा कुँवर का मंदिर है। इसके स्‍थानीय लोगों में भगवान विष्‍णु के अवतार होने की मान्‍यता भी प्रचलित है। इस मूर्ति के भी करीब पाँच सौ वर्ष पुराना होने का प्रमाण मिलता है। माथा कुँवर की मूर्ति काले पत्‍थर से बनी है। इसकी ऊँचाई करीब तीन मीटर है। मूर्ति भगवान बुद्ध के बोधि प्राप्‍त करने से पूर्व की ध्‍यान मुद्रा में है।

महापरिनिर्वाण मंदिर

कुशीनगर का महत्‍व महापरिनिर्वाण मंदिर से है। इस मंदिर का स्‍थापत्‍य अजंता की गुफाओं से प्रेरित है। मंदिर के डाट हूबहू अजंता की गुफाओं के डाट की तरह हैं। इस मंदिर में भगवान बुद्ध की लेटी हुई (भू-स्‍पर्श मुद्रा) 6 मीटर लंबी मूर्ति है, जो लाल बलुई मिट्टी की बनी है। यह मंदिर उसी स्‍थान पर बनाया गया है, जहाँ से यह मूर्ति निकाली गई थी। मंदिर के पूर्व हिस्‍से में एक स्‍तूप है। यहाँ पर भगवान बुद्ध का अंतिम संस्‍कार किया गया था। मूर्ति भी अजंता के भगवान बुद्ध की महापरिनिवार्ण मूर्ति की प्रतिकृति है। वैसे मूर्ति का काल अजंता से पूर्व का है। करीब 2500 वर्ष पुरानी मूर्ति।

जापानी मंदिर

महापरिनिर्वाण मंदिर के उत्‍तर में मौजूद जापानी मंदिर अपनी विशिष्‍ट वास्‍तु के लिए प्रसिद्ध है। अर्द्धगोलाकर इस मंदिर में भगवान बुद्ध की अष्‍टधातु की मूर्ति है। मंदिर सुबह 10 से शाम 4 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है। मंदिर के चार बड़े-बड़े द्वार हैं, जो सभी दिशाओं की ओर बनाए गए हैं। इस मंदिर की देखरेख जापान की एक संस्‍था की ओर से की जाती है।

वाट थाई मंदिर

वर्तमान में सबसे आकर्षण का केंद्र यहाँ पर हाल ही में निर्मित वाट थाई मंदिर है। मंदिर का निर्माण थाईलैंड सरकार के सौजन्‍य से किया गया है। सफेद पत्‍थरों से बने इस मंदिर के दो तल हैं। निचला तल बौद्ध भिक्षुओं के ध्‍यान और साधना के लिए है, वहीं दूसरा, ऊपरी तल सभी पर्यटकों के लिए खुला है। इस मंदिर में थाई शैली की भगवान बुद्ध की अष्‍टधातु की मूर्ति है। मंदिर का वास्‍तु थाईलैंड के मंदिरों जैसा ही है। इसकी संरक्षिका थाईलैंड की राजकुमारी हैं। मंदिर के शीर्ष पर सोने की परत लगाई गई है। साथ परिसर के चारों ओर भव्‍य बागवानी की गई है। पौधों का विशेष आकार भी पर्यटकों को अपनी ओर खींचता है। मंदिर परिसर में मौजूद चैत्‍य सभी के आकर्षण का केंद्र बन जाता है। लोग बरबस इस सोने की परत चढ़े चैत्‍य के साथ फोटो खींचना चाहते हैं।

जल मंदिर और पैगोडा– महापरिनिर्वाण मंदिर से पहले बीच तालाब में बना भगवान बुद्ध का मंदिर और इसके सामने बना विशाल पैगोडा पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र है। जल मंदिर तक जाने के लिए तालाब के ऊपर पुल का निर्माण किया गया है। इसमें कछुओं और बतख के साथ ही मछलियों को अठखेलियाँ करते देखना बहुत अच्‍छा लगता है। ठीक सामने मौजूद पैगोडा के ऊपर बँधी घंटियाँ सुरम्‍य और शांत वातावरण में जब बजती हैं तो लगता है कि ये सभी दिशाओं में अहिंसा और प्रेम का संदेश दे रही हों।

रामाभार स्‍तूप– भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के बाद 16 महाजनपदों में उनकी अस्‍थियों और भस्‍म को बाँट दिया गया। इन सभी स्‍थानों पर इन भस्‍मों और अस्‍थियों के ऊपर स्‍तूप बनाए गए। कुशीनगर में मौजूद रामाभार का स्‍तूप इन्‍हीं में से एक है। करीब 50 फुट ऊँचे इस स्‍तूप को मुकुट बंधन विहार कहा जाता है। हालाँकि स्‍थानीय वाशिंदों में यह रामाभार स्‍तूप के नाम से ही आज भी जाना जाता है।

कैसे पहुँचें ?

कुशीनगर गोरखपुर से 52 किलोमीटर की दूरी पर नेशनल हाईवे नं 28 पर स्‍थित है। यहाँ पहुँचने के लिए सबसे नजदीकी रेलवे स्‍टेशन गोरखपुर रेलवे जंक्‍शन है। गोरखपुर से हर घंटे कुशीनगर (कसया) के लिए बसें मिलती रहती हैं। गोरखपुर से देश के लगभग सभी प्रमुख शहरों के लिए ट्रेन की सुविधा उपलब्‍ध है। इसके साथ ही गोरखपुर से दिल्‍ली, मुंबई और कोलकाता के लिए हवाई सुविधा भी उपलब्‍ध है। दिल्‍ली और लखनऊ से पर्यटन विभाग की ओर से भी विदेशी और घरेलू पर्यटकों के लिए वाहन और रहने की व्‍यवस्‍था की जाती है।