कामदेव सिंह का जन्म 1930 के दशक में बेगूसराय बिहार में हुआ। बहुत सारे कम्युनिस्ट को मारकर ही बिहार में सुर्ख़ियों में आया बेगूसराय का सम्राट कामदेव सिंह। नक्सलियों और कम्युनिस्ट के कट्टर विरोधी थे कामदेव सिंह।

Kamdeo Singh- Begusarayi

100 सफेद एंबेसेडर ख़रीदा एक साथ 

बेगूसराय ही नहीं पूरे बिहार के ‘सम्राट कामदेव सिंह’। कहते हैं ‘कामदेव सिंह’ के गोदाम के गेटकीपर के पास भी आज पटना में करोड़ों की धन संपदा है। वो खुद बेगूसराय के रोबिनहुड थे। हर साल अपने क्षेत्र में सैकड़ों गरीब बाप की बेटी की शादी का पूरा खर्च उठाते थे। वो खुद कम्युनिस्ट विचारधारा के मालिक थे, पर इंदिरा गांधी का आशीर्वाद मिला हुआ था। जब इंदिरा गांधी बेगूसराय आयीं, तब उन्होंने एक नंबर से लेकर सौ तक, सभी सफेद एंबेसेडर से उनका स्वागत किया था।  कहते हैं, बिहार पुलिस के वो सभी अधिकारी जो नेपाल सीमा पर पोस्टेड थे, जितनी तनख्‍वाह सरकार उन्‍हें देती थी, उतनी ही तनख्‍वाह कामदेव सिंह उन्‍हें देते थे।

CRF टीम पर भी पड़े भारी

ज्ञानेश्वर जी (सीनियर जर्नलिस्ट ) ने कामदेव सिंह के लिए रिसर्च किया है. उनके हिसाब से कामदेव सिंह को मारने के लिए CRF टीम को आना पड़ा था क्यों की बिहार पुलिस की सारी कोशिश असफल हो गयी थी। कामदेव सिंह किसी को भी विधायक बना सकता था , इंडिया टुडे ने लिखा था की, अगर कामदेव सिंह चाहे तो एक चूहा भी विधयाक का चुनाव जीत सकता था।

कामदेव सिंह ने की यूरेनियम की चोरी 

कामदेव सिंह सबसे पहले बैलगाड़ी चलता था और ऐसी क्रम में उसकी दोस्ती डकैतो से हुई। फिर कुछ पैसे कमा के डकैती चोर के तस्कर  बन गया। कामदेव सिंह ने ही यूरेनियम की चोरी कर के नेपाल और पाकिस्तान को बेचा था , ऐसा सूत्रों से पता चला था।

रामचंद्र खान ( SP ) जो सबसे कामयाब माने जानते थे क्राइम को ख़तम करने में, उनकी पोस्टिंग बेगूसराय की गयी कामदेव सिंह को ख़तम करने के लिए।  उनकी डायरी के हिसाब से जब उन्होंने अपना ऑपरेशन बेगुरसाय में शुरू  किया तब कामदेव सिंह नेपाल भाग गया।  कहा जाता है की एक बार नेपाल नरेश ने कामदेव को पकड़ा था , और जेल में भी बंद किया था , पर उन्होंने उसको चोर दिया था , और आज़ादी के बदले उन्होंने कामदेव से वह के सबसे बड़े नक्संवादी को मारे की बात कही जो नेपाल की पुलिस भी नहीं केर पा थी और कामदेव सिंह ने उसको महज 3 दिन में ख़तम कर दिया।

खुद को मारी गोली

1980 में कामदेव सिंह पे 10000/- का इनाम घोषित किया गया था |  18 अप्रैल 1980 में CRPF ने कामदेव सिंह को मार गिराया। कुछ लोगो का यह भी कहना है की उसको पुलिस नहीं मार पायी थी उसने  खुद को गोली मार ली थी।  अलग अलग लोग और उनकी अलग अलग मान्यता।

(Note:हम किसी भी तरह से कामदेव सिंह या उनके किये गए कामों को support या बढ़ावा नहीं दे रहे हैं, हमारा मकसद सिर्फ आप तक जानकारी पहुँचाना है।)