वैसे तो देश में एक से बढ़कर एक स्कुल हैं पर बिना पैसे की खनक सुनाये उसमे दाखिला नहीं मिल सकता | तब गरीबों के बच्चों की शिक्षा – दीक्षा कैसे होगी | माना की गरीब बच्चों के लिए सरकारी स्कुल है लेकिन वो भी प्रयाप्त नहीं है| ऐसे में दिल्ली के एक छोटे व्यापारी इन वंचित बच्चों के लिए एक किरण बन कर उभरे हैं | ये ‘द फ्री स्कूल अंडर द ब्रिज’ नाम से एक स्कुल चलाते हैं  जहां न तो कोई क्लास रूम है और न ही कोई इमारत। यह स्कूल पूर्वी दिल्ली स्थित यमुना बैंक स्टेशन के पुल के नीचे चलाया जा रहा है। इस स्कूल में 300  गरीब बच्चे पढ़ते हैं जो पैसों की कमी की वजह से न तो निजी स्कूल में जा सकते हैं और न ही इनको सरकारी स्कूल में जगह मिलती है।

आजीविका के लिए किराने की दूकान चलाते हैं

गरीब बच्चों के जीवन में शिक्षा की ज्योत जलाने वाले राजेश कुमार शर्मा मूल रूप से उत्तर प्रदेश में हाथरस के रहने वाले हैं और आजीविका के लिए लक्ष्मी नगर में एक किराने की दुकान चलाते हैं |  राजेश कुमार शर्मा बच्चों की शिक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं और यह सुनिश्चित कर रहे हैं कि बच्चों को वह बुनियादी शिक्षा मिले जो उन्हें उनके जीवन को आगे बढ़ने के लिए चाहिए। पिछले 13 वर्षों से, राजेश दिल्ली में यमुना नदी के तट के पास मेट्रो पुल के नीचे 300 वंचित बच्चों को पढ़ा रहे हैं।

निःशुल्क पढ़ाई होती है इस स्कुल में

यह पढ़ने वाले  बच्चो के मां-बाप मजदूरी करके या सब्जी का ठेला लगाकर अपने परिवार का पेट पालते है। यही वजह है कि फीस नही भर सकते। इसलिए वह अपने बच्चों को इस स्कूल में पढने के लिए भेजते है क्योंकि इस स्कूल में बच्चों से कोई फीस नही ली जाती।

दो शिफ्ट में चलता है यह स्कुल

‘द फ्री स्कूल अंडर द ब्रिज’ नाम का ये स्कूल दो शिफ्ट में चलता है, पहली शिफ्ट होती है सुबह 9 से 11 बजे जिसमें 120 लड़के पढ़ते हैं और दूसरी शिफ्ट होती है दोपहर 2 से 4: 30 बजे जिसमें 180 लड़कियां पढ़ती हैं। स्कूल में सात शिक्षक भी हैं जो अपने खाली समय में चार से चौदह वर्ष की आयु के इन छात्रों को पढ़ाने के लिए आते हैं। अन्य स्कूलों के विपरीत, इस ओपन स्कूल में पुल के नीचे कोई स्ट्रक्चर नहीं है, इनके पास केवल पांच ब्लैकबोर्ड हैं।

ये ब्लैकबोर्ड दीवार पर पेंटिंग से बने हैं। शिक्षकों की सहायता के लिए, स्कूल के पास चाक, डस्टर, पेन और पेंसिल जैसी बुनियादी स्टेशनरी है। छात्र अपनी नोटबुक लाते हैं और उस जमीन पर बैठकर पढ़ते हैं। जमीन को कार्पेट से ढका हुआ है। स्कूल में लड़कियों और लड़कों दोनों के लिए अलग-अलग शौचालय की सुविधा है, इसके अलावा छात्रों को बुनियादी स्वच्छता और सफाई के बारे में भी पढ़ाया जाता है।