मुरदेश, भारत के कर्नाटक के भटक्का तालुक शहर में है जो उत्तर कन्नड़ जिले में है। यह मंदिर दुनिया की दूसरी सबसे ऊंची शिव प्रतिमा में आती है। यहाँ की खुबसुरती एक बार जो आपके दिल में उतरती है फिर आप उस दृश्य को कभी नहीं भूल पाते है। कहते है की जो यहाँ मन से एक बार शिव की पूजा की पूजा करता है और जो भी उनसे माँगता है , वह शिवा उसको पल भर में ही दे देते है।

ऐसा मंदिर जो तीन ओर से अरब सागर से घिरा हुआ है –

यह मंदिर कंडुका पहाड़ी पर बना है जो तीन तरफ से अरब सागर से घिरा है। ‘गोपुर’ जो मुख्य मंदिर का प्रवेश द्वार है , 123 फीट की ऊंचाई पर स्थित है और आप गोपुरा के ऊपर से शिव प्रतिमा के मनमोहक दृश्य को देख सकते हैं। चारो तरफ अरब सागर और एक तरफ शिवा का विशाल मूर्ति एक सवप्न जैसा लगता है। इस मंदिर की पूरी सतह को सबसे जटिल और विस्तृत नक्काशी में कवर किया गया है जिसे आपने कभी नहीं देखा होगा और आप ऐसी नक्काशी भारत के ही मंदिरो में पाएंगे। मंदिर का मुख्य देवता श्री मृद्या लिंग है, जिसे मूल अत्मा लिंग का एक हिस्सा माना जाता है।

इतिहास और किंवदंतियों के अनुसार मंदिर की महत्तवता –

मंदिर का इतिहास रावण से ज़ुरा हुआ है। हिंदू देवताओं को अजेयता और अमरता के लिए आत्मा लिंग की तपस्या की ,जिसके परिणामस्वरूप भगवान शिव ने उनको अमरता का ववरदान दिया। इसी कारण रावण ने भी लालच में आ कर शिव की पूजा की और अजेयता और अमरता प्राप्त करने के लिए तपस्या की।
जब भगवान शिव उनकी भक्ति को देखकर रावण के सामने आते हैं और वह रावण तब देवी पार्वती को माँगता है और भगवान इस प्रकार रावण को पार्वती देते हैं।

विष्णु जी ने रची लीला –
उसे विश्वास दिलाते हुए धोखा दिया कि जो उसके साथ था वह पार्वती नहीं था और असली पार्वती पाथला में है। फलस्वरूप रावण ने पाथला में जाकर एक राजा की बेटी से शादी की, जिसका मानना ​​था कि वह वास्तविक पार्वती थी। यह जानने के बाद कि वह नारायण द्वारा मूर्ख बनाया गया है, वह फिर से ध्यान करने के लिए बैठता है जिसके परिणामस्वरूप भगवान शिव प्रकट होते हैं। इस बार उसने भगवान शिव से उसे पवित्र आर्त लिंग के साथ आशीर्वाद देने के लिए कहा । शिव ने उसकी मांग को स्वीकार करते हुए, उसे लिंगम दिया लेकिन रावण के सामने एक शर्त रखी कि अगर कभी इस लिंगम को जमीन पर रखा जाएगा तो उसकी सारी शक्तियां भगवान शिव के पास वापस आ जाएंगी ।

भगवान गणेश ने रूप धारण कर लिया और रावण को मज़बूर किया की वोह वह शाम के अनुष्ठान के लिए जाते समय आत्म लिंग को जमीन पर रख दें। भगवान गणेश की योजना ने काम किया और जब रावण लौटा तो उसने लिंग को जमीन पर पाया । वह उग्र हो गया और वोह समझ गया की सब चाल थी । रावण ने गुस्से में लिंगम को नष्ट करने की कोशिश की और आटमा लिंगम को कवर करने वाले कपड़े का टुकड़ा उन्होंने मृदेश्वर को फेंक दिया, जिसे बाद में मुरुदेश्वर नाम दिया गया।

यात्रा करने के लिए सबसे अच्छा महीने
नवंबर से फरवरी

कैसे पहुंचा जाये
निकटतम सड़क – मैंगलोर से 165 किमी और बैंगलोर से 455 किमी

निकटतम रेलवे स्टेशन – मुरुदेश्वर स्टेशन मंदिर से केवल 2 किमी दूर है।

हवाई मार्ग से – मंदिर से निकटतम हवाई अड्डा मैंगलोर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है जो मंदिर से लगभग 165 किमी की दूरी पर स्थित है।

मंदिर का समय
डे टाइमिंग – सुबह 6 बजे खुलता है और रात 8:30 बजे बंद हो जाता है।

दोपहर का भोजन – दोपहर 1 से 3 बजे

सुबह की पूजा – सुबह 6:30 से शाम 7:30 तक

दोपहर महापूजा – दोपहर 12:15 बजे से दोपहर 1 बजे तक

रात्रि पूजा- शाम 7:15 बजे से रात 8:15 बजे तक

त्योहारों की घोषणा मंदिर में की गई
महा शिवरात्रि (फरवरी या मार्च) और कार्तिक (नवंबर से दिसंबर) पूर्णिमा को पूरे उत्साह और उत्साह के साथ मंदिर में मनाया जाता है। और हज़ारो की सख्या में लोग आ कर अपनी इक्छा पूरी करने करने के लिए पूजा करते है।