दुनिया के किसी भी शहर, कस्बे या मोहल्ले के नाम के पीछे उसके बसने की कहानी के पीछे एक इतिहास होता है, जो उस स्थान की जड़ों की ओर ले जाता है।  और हम इन नामों को सुनते-सुनते इतने आदी हो जाते हैं कि कभी ठहरकर उन नामों के पीछे के इतिहास को समझने की कोशिश नहीं करते | आज जब बात पटना की हो रही है तो पटना के मोहल्लों और प्रखंडों के नामकरण के पीछे भी एक इतिहास छिपा है, हर नाम अपने आप में एक इतिहास समेटे हुए है।तो आइए जानते हैं पटना के इलाकों के नाम के पीछे का इतिहास

पटना का प्राचीन नाम था पाटलिपुत्र

आज का पटना कभी पाटलिपुत्र के नाम से जाना जाता था। कहा जाता है कि पटना जब गांव था यहां बहुत सारे पाटलि वृक्ष थे। इन पाटलि वृक्षों के कारण ही इसका नाम पहले पाटलिग्राम और फिर नगर बनने पर पाटलिपुत्र पड़ा। इसके बाद मुगल बादशाह औरंगजेब ने अपने प्रिय पोते और सूबेदार मुहम्मद अजीम के अनुरोध पर 1704 ई. में शहर का नाम अजीमाबाद कर दिया। अजीमाबाद के बाद इस शहर को वर्तमान नाम पटना मिला। कुछ जानकारों के अनुसार, पटना शब्द पत्तन से बना है। गंगा के बड़े और चौड़े घाटों के कारण यहां बड़े-बड़े जहाजों से माल की ढुलाई होती। पत्तन से यह शब्द अपभ्रंश होकर पटना हो गया।

पटना का पहला बोरिंग था बोरिंग रोड में

पटना के सबसे महंगे इलाके में शुमार बोरिंग रोड से आप सब रूबरू होंगे मगर कभी आपने सोचा है कि इसका नाम बोरिंग रोड क्यों पड़ा? दरअसल, पटना की पहली बोरिंग इसी इलाके में हुई थी। एएन कॉलेज के आगे बोरिंग रोड में हुई बोरिंग के नाम इसका नाम बोरिंग रोड पड़ा।

बगीचों के नाम से बना गुलजार बाद और गर्दनीबाग

गुलजारबाग और गर्दनीबाग का नाम यहां मौजूद बगीचों के कारण पड़ा। ये दोनों ही इलाके बाग के लिए मशहूर थे। इसके अलावा गर्दनीबाग नाम के पीछे एक और कहानी भी है। यह इलाका आदिवासी लोगों का गढ़ हुआ करता था। यहां गर्दनिया नामक आदिवासी रहते जो यात्रियों से लूट कर उन्हें जान मार देते थे।

छज्जू माली के नाम पड़ा छज्जूबाग

गांधी मैदान के पश्चिम दक्षिण स्थित छज्जूबाग मोहल्ले का नाम छज्जू माली के नाम पर पड़ा। जो विशाल बाग-बगीचे का देखभाल किया करते थे। इस बगीचे के प्रमुख आम अलीवर्दी और सिराजुद्दौला को भेजा जाता था। इस मोहल्ले में छज्जू शाह का मकबरा आज भी है।

मालसलामी

पटना सिटी स्थित चुंगीकर कार्यालय या कारवां सराय के नाम पर जगह का नाम मालसलामी पड़ा। सलामी या टैक्स के रूप में व्यापारियों की अपने माल के बदले एक निश्चित रकम देना पड़ता था।

नगला मोहल्ला

मालसलामी मुहल्ला के दक्षिण नगला या नगरा मोहल्ला नगरम से बना है। अजातशत्रु ने सर्वप्रथम यहां चारदीवारी वाला नगर बसाया था।

बड़ी एवं छोटी पहाड़ी : पटना सिटी के दक्षिण -पूर्व स्थित बड़ी और छोटी पहाड़ी का नामाकरण अशोक मौर्य ने करवाया था। बौद्ध स्तूपों के कारण इनका नाम बड़ी एवं छोटी पहाड़ी पड़ा।

मखानियां कुआं

पी एम सी एच के पास एक मोड़ पर कुआं हुआ करता था जहां पर एक व्यक्ति प्रतिदिन आकर मक्खन बेचा करता था। आने वाले दिनों इस जगह का नाम मखानियां कुआं हो गया।

त्रिपोलिया

पटना सिटी स्थित त्रिपोलिया जहां तीन पोल या तीन प्रकार के फाटक हुआ करते थे। मुगलकाल में एक ऐसा बाजार था जिसमें आने-जाने के लिए तीन बड़े द्वार या रास्ते थे। वही त्रिपोलिया अस्पताल के पास मुगलकाल में चिडिय़ा मारने वाले लोग रहा करते थे। जिस कारण मोहल्ले का नाम मीर शिकार टोह पड़ा।

लोहानीपुर

लोहानीपुर मोहल्ले को आज से पूर्व नुहानीपुर हुआ करता था। इसी मोहल्ले में बिहार के दीवान नबाव मीर कासीम का जन्म हुआ था।

खजांची रोड

पटना कॉलेज और खुदाबख्स लाइब्रेरी के बीच उत्तर की ओर जाने वाली सड़क खजांची रोड से जानी जाती है। 19 वीं सदी के अंत और 20 वीं सदी के प्रथम चरण में सरकार को ब्याज पर कर देने वाले धनी व्यक्ति रहा करते थे जिन्हें खजांची बाबू भी कहा जाता था। इन्हीं लोगो के कारण इस मोहल्ले का नाम खजांची रोड पड़ा।

भिखना पहाड़ी

पटना कॉलेज के दक्षिण निचली सड़क पर स्थित भिखना पहाड़ी बौद्ध भिक्षुओं का गढ़ हुआ करता था। मौर्य काल में यहां बौद्ध मठ थे जिसमें बौद्ध भिक्षु रहा करते थे। इसके अलावा भिखना कुआं देवी एवं भिखना कुंवर नामक एक संत रहा करते थे। जिसके बाद इस मोहल्ले का नाम भिखना पहाड़ी रखा गया।

रमणा रोड

बौद्ध भिक्षु हरे-भरे बाग में टहला करते थे जिसे रमण के नाम से भी जानते थे। इस क्षेत्र को अंग्रेजों ने मनीसरूल्ला नामक नबाव को दिया जो शाह आलम द्वितीय से दीवानी अधिकार प्राप्त किया।

पीरबहोर मोहल्ला

मोहल्ले का नाम संत दाता पीरबहोर के नाम पर पड़ा। जिनका मजार आज भी दाता मार्केट से सटे है। संत दाता पीरबहोर शाह अरजान के समकालीन थे।

बादशाही गंज मोहल्ला

पटना साइंस कॉलेज के इलाका जो बादशाही गंज के नाम से मशहूर हुआ। इस क्षेत्र में औरंगजेब का पोता फर्रुखसियर आया था जिसे खुश करने के लिए मोहल्ले का नाम बादशाही गंज रखा गया। बाद में इसी मोहल्ले में ठठेरों की बस्ती विकसित हुई जिसे ठठेरी बाजार कहा जाने लगा।

मछुआ टोली

आर्य कुमार रोड से सटे मछुआरों की बस्ती वाला मोहल्ला मछुआ टोली के नाम से विख्यात हुआ। इस मोहल्ले के लोग गंगा नदी और दरियापुर गोला से बरसात के मौसम में मछली पकड़ लाकर बेचा करते थे।

मुरादपुर

जहांगीर कालीन बिहार के गर्वनर मिर्जा रूस्तम सफवी के पुत्र मिर्जा मुराद 17 वीं सदी में एक  प्रतिष्ठित व्यक्ति हुआ करते थे। उन्हीं के नाम पर मोहल्ले का नाम मुरादपुर पड़ा। यह मोहल्ला पटना सिटी के एसडीओ कोर्ट के पास स्थित है।

कंकड़बाग

पटना के दक्षिण एरिया में स्थित शहर का विशाल मोहल्ला कंकड़बाग बना है। कंकड़बाग का इलाका बादशाह अकबर द्वारा ईरान के शाह तहमरूप के पुत्र को जागीर के रूप में प्रदान किया गया था। लाल बालू, मिट्टी, कंकड़ और झाडिय़ों के कारण यह इलाका कंकड़बाग से मशहूर हुआ।

लंगर टोली

मछुआ टोली के सटे मोहल्ले जहां बरसात के दिनों में पानी लग जाता था। जिसके कारण लंगर वाले नाव चला करता था। जिसके कारण इस मोहल्ले का नाम लंगरटोली पड़ा।

फ्रेजर रोड

गांधी मैदान से पटना रेलवे स्टेशन की ओर जाने वाली सड़क फ्रेजर रोड का नाम बंगाल के लेफ्टिनेंट गर्वनर सर ए एच एल फ्रेजर के नाम पर वर्ष 1906 में इस रोड का नाम फ्रेजर रोड पड़ा।

दरियापपुर

अफगानों के शासनकाल में बिहार का तत्कालीन गर्वनर दरियाखां नूहानो के नाम पर मोहल्ले का नाम दरियापुर पड़ा।

 

 

 

niraj kumar

एक बेहतरीन हिंदी स्टोरी राइटर , और समाज में अच्छीबातोंको ढूंढ कर दुनिया के सामने उदाहरण के तौर पे पेश करते है |
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