बिहार का सारण जिला अतीत से हीं महान विभूतियों का गढ़ रहा है | भारत की लड़ाई में उनका योगदान जगजाहिर है | ऐसे हीं स्वतंत्रता सेनानियों में एक नाम गड़खा अंचल स्थित मिर्जापुर ग्राम के बाबू फिरंगी सिंह का भी आता है | जिन्हे प्यार से गांव के लोग काका जी और स्थानीय लोग गाँधी जी के नाम से सम्बोधित करते थे | वास्तव में महात्मा गाँधी जिन्हे पुरे देश में आजादी के काम को अंजाम देना था, वे बड़ी दूरदर्शिता से भारत के सुदूर गांवों में भी अपने आंदोलन का मजबूत नेटवर्क तैयार कर रखा था | और जगह-जगह उनके बात से कार्यों को सम्पादित करने अथवा आगे बढ़ाने वाले उनके सच्चे प्रतिनिधि उन्ही के नाम से जाने जाने लगे थे | बाबू साहेब ऐसे ही आजादी के दीवाने, देश भक्त और समाजसेवी थे |

सादगी के प्रतिमूर्ति थे बाबु साहेब

वैसे तो फिरंगी सिंह का जन्म एक जमींदार परिवार में हुआ था, पर शिक्षा के छेत्र में कोई उल्लेखनीय उनके पास नहीं थी, लेकिन नियमित अध्ययन के कारण वे किसी भी विषय पर घंटो बोल सकते थे | गठीला शरीर, गोरा रंग, गोल भरा चेहरा और मीतभाषी | खाली समय में उनका जीवन अपने कमरे में अध्ययन करते हुए बीतता था | कड़ी का सफ़ेद वस्त्र तो उन्होंने प्रारम्भ से हीं अपना रखा था, आगे चल कर गोल चश्मा भी धारण करने से वे बिलकुल गाँधी जी का हीं स्वरुप लगने लगे थे

सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ थे फिरंगी सिंह

उनका बचपन अखाड़े में बीता | यत्र-तत्र विद्यालय की स्थापना में उनके सहयोग का भी इतिहास रहा है | मिर्जापुर के समीप के सभी गांवों में बहुत पहले स्थापित संस्कृत विद्यालय (अब नहीं है ) भगवानपुर के शहीद इंद्रदेव बेसिक स्कुल ( अब राजकीय बुनियादी विद्यालय ) और फतेहपुर में स्थापित सर्वोदय हाई स्कुल उनकी सोंच का प्रतिकूल है | असल में ये सब स्वतंत्रता आंदोलन के साथ-साथ चलने वाले समाजोपयोगी कार्यक्रम था जिसे महात्मा गाँधी एक पंथ दो काज…..  के रूप में बड़ी सूझ-बुझ के साथ चलाते थे | काका जी भी बाल विद्या प्रचारिणी महा सभा से जुड़ कर शिक्षा का प्रचार प्रसार कर रहे थे | एक दूसरा कार्यक्रम छुआ-छूत उन्मूलन का था जिसे हर विद्यालय में साल में कम से कम किसी एक दिन बच्चों को एक साथ खाना खिलाकर पूरा करने की कोशिश की जाती थी |

समाज के चहेते थे फिरंगी सिंह

16 वर्ष की उम्र में हीं श्री सिंह यूनियन प्रेसिडेंट निर्वाचित हो गए थे 1965 ई तक भारत सेवक समाज गड़खा के संयोजक रहे | इसी तरह 1930 से 1940 तक गड़खा थाना कांग्रेस कमिटी के अध्यक्ष पद पर रह कर उन्होंने नेशनल कांग्रेस के काम को सारण में सक्रिय बनाये रखने में सहयोग दिया था |  यह उनकी जनता के बीच लोकप्रियता थी \ 1937 से वे दो बार सारण जिला के लोकल बोर्ड के अध्यक्ष चुने गए |

जेल उनके लिए तीर्थ स्थल के समान थी

जैसा की स्वाभाविक था आजादी का यह सिपाही महात्मा गाँधी के सविनय अवज्ञा आंदोलन में पहली बार कुछ माह के लिए जेल भेजा गया, फिर तो जेल यात्रा इनके लिए जैसे तीर्थ स्थल बन गई थी | दूसरी बार बाबूसाहेब को असहयोग आंदोलन के दौरान 13 जनवरी 1932 को हजारीबाग जेल की यात्रा करनी पड़ी | वहां से 13 मई 1932 में जब रिहा हुए तब पुनः भारत छोड़ो आंदोलन में 7 सितम्बर से 14 सितम्बर 1932 तक तीसरी बार गिरफ्तार कर छपरा जेल भेज दिए गए |  वह से 2 अप्रैल 1943 को मोतिहारी फिर 17 सितम्बर 1973 को भागलपुर कैम्प जेल की हवा कहानी पड़ी |

इस जेल से 17 अप्रैल 1946 को 172 साथियों के साथ प्रातः 3 बजे जब उनकी रिहाई हुई तो २० अप्रैल को छपरा कचहरी स्टेशन पहुँचने पर जय प्रकाश नारायण के नेतृत्व में जहरों की संख्या में जनता ने फूल मालाओं से लाद कर जुलुस के शक्ल में उनका स्वागत किया और हांथी पर बैठा कर 21 तारिख को मिर्जापुर उनके घर पहुँचाया

लोगों के सेवार्थ फिरंगी सेवा सदन की हुई स्थापना

उनका जन्म माघ शुक्ल दशमी विक्रम सम्वत 1940 दिन शुक्र वार को हुआ था | अंग्रेजी कैलेंडर में ये तिथि 6 फरवरी 1883 को पड़ती है उनके पिता जी का नाम श्री रूप नारायण सिंह एवं माता जी का लखरानी देवी था | पत्नी थी श्रीमती सुरेख देवी | बाबु फिरंगी सिंह का देहावसान 1967 ई में हो गया था | उनके दो सुपुत्र क्रमशः विशेश्वर सिंह और सोमेश्वर प्रसाद सिंह आजीवन उनकी याद अक्षुण्ण रखने का अन्यक प्रयास करते रहे हैं | अब उनके पौत्र गण उनकी स्मृति जुगाये रखने में जी-जान से लगे हैं | गांव और पास-पड़ोस के प्रबुद्ध जनों का सहयोग भी इसे नियमित सक्रीय रखने में प्रत्येक वर्ष उनकी श्रद्धांजलि सभा में देखने को मिलता है | सम्प्रति उनके घर के सामने सड़क के किनारे परिवार के सहयोग से उनकी सफ़ेद मूर्ति स्थापित है | साथ हीं उनके नाम पर गठित फिरंगी सेवा सदन मिर्जापुर, गड़खा सारण प्रत्येक वर्ष उनकी जयंती के बहाने विभिन्न कार्यक्रम आयोजित कर उनके काम को आगे बढ़ा रहा है | इस संस्था की स्थापना 1969 ई को हुई थी जिसका उद्देश्य था —

शिक्षा,संस्कृति, स्वास्थ, के छेत्र में सर्वांगीण विकास हेतु स्थानीय लोगों को देश और समाज के हित में प्रेरित और प्रोत्साहित करना | सीमा छेत्र रखा गया है। …..  जितना संभव हो सके उतने दूर का गांव | अपने स्थापना काल से अब तक  इस संस्था ने सांस्कृतिक प्रतियोगिताएं कराकर सफल विधार्थियों को पुरस्कृत किया है तो ग्रामीण युवकों को बॉलीबाल, कबड्डी, क्रिकेट, एवं देश भक्ति गायन की प्रतियोगिताए आयोजित कर विजयी टीम और प्रतिभागियों को कप, शील्ड, पदक या प्रतिक चिन्ह देकर प्रतोत्साहित किया है |विशिष्ट कवियों एवं व्यवसायिक कलाकारों को आमंत्रित कर इसने समय-समय पर कवि सम्मेलन एवं शास्त्रीय तथा लोक गीतों के प्रदर्शन का नमूना भी प्रस्तुत कराया है ताकि नई पीढ़ी सम्बंधित कला में निपुणता प्राप्त कर सके |

niraj kumar