छोटी आयु में अंग्रेजों के शासन को जड़ से उखाड़ फैंकने की प्रतिज्ञा करने वाले अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद (Chandrashekhar Azad) का नाम आते ही हर भारतवासी का मस्तक श्रद्धा से झुक जाता है। 23 जुलाई 1906 को पंडित सीताराम तिवारी के घर जन्मे इस बालक से आगे युवावस्था में अंग्रेज थरथर कांपते थे |  जैसे वो जीते जी अंग्रेजों के लिए मिथक रहे, उनकी शहादत के बाद भी उनसे जुड़ी कई चीजों को लेकर रहस्य बना रहा | 

Chandrashekhar Azad

बचपन में हीं सिख लिए थे निशानेबाजी के सारे गुण माँ की इच्छा थी संस्कृत में प्रकाण्ड विद्वान बनें

आजाद का प्रारम्भिक जीवन आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में स्थित भाबरा गांव में बीता था | बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष बाण चलाए थे |  इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीख ली थी | आजाद की मां चाहती थीं कि वो संस्कृत पढें और प्रकाण्ड विद्वान बनें |  संस्कृत की पढ़ाई करने के लिए 12 साल की उम्र में आजाद बनारस गए ,जहां पं. शिव विनायक मिश्र उनके लोकल गार्जियन की तरह थे |

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शिव विनायक मिश्र खुद उन्नाव से थे और आजाद के दूर के रिश्तेदार भी थे |  पं. शिव विनायक मिश्र नगर कांग्रेस कमेटी के सेक्रेटरी थे और बनारस के बड़े कांग्रेस नेताओं में से एक थे | जलियांवाला बाग नरसंहार समय चन्द्रशेखर आजाद बनारस में पढ़ाई कर रहे थे |  गांधीजी ने सन् 1921 में असहयोग आन्दोलन का फरमान जारी किया तो तमाम अन्य छात्रों की तरह आजाद (Chandrashekhar Azad) भी सड़कों पर उतर आए |

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Chandrashekhar Azad को मिली थी 15 कोड़ों की सजा

पहली बार गिरफ़्तार होने पर उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई. हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, ‘वन्दे मातरम्’ और ‘महात्मा गांधी की जय’ का स्वर बुलंद किया |  इसके बाद वे सार्वजनिक रूप से ‘आजाद’ पुकारे जाने लगे | .इस घटना का उल्लेख पंडित जवाहरलाल नेहरू ने कायदा तोड़ने वाले एक छोटे से लड़के की कहानी के रूप में किया है |  ‘ऐसे ही कायदे (कानून) तोड़ने के लिये एक छोटे से लड़के को, जिसकी उम्र 15 या 16 साल की थी और जो अपने को आज़ाद कहता था, बेंत की सजा दी गई |

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वह नंगा किया गया और बेंत की टिकटी से बांध दिया गया |  जैसे-जैसे बेंत उस पर पड़ते थे और उसकी चमड़ी उधेड़ डालते थे, वह ‘भारत माता की जय!’ चिल्लाता था |  हर बेंत के साथ वह लड़का तब तक यही नारा लगाता रहा, जब तक वह बेहोश न हो गया |

इस घटना के कारण कांग्रेस से हुआ मोहभंग

असहयोग आन्दोलन के दौरान जब फरवरी 1922 में चौरी चौरा की घटना के पश्चात् गांधीजी ने आन्दोलन वापस ले लिया तो देश के तमाम नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया |  जिसके बाद पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ का गठन किया. चन्द्रशेखर आज़ाद भी इस दल में शामिल हो गए | हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ ने धन की व्यवस्था करने के लिए जब गांव के अमीर घरों में डकैतियां डालने का निश्चय किया तो यह तय किया गया कि किसी भी औरत के ऊपर हाथ नहीं उठाया जाएगा | एक गांव में राम प्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में डाली गई डकैती में जब एक औरत ने आज़ाद का पिस्तौल छीन ली तो अपने बलशाली शरीर के बावजूद आज़ाद ने अपने उसूलों के कारण उस पर हाथ नहीं उठाया |

खुद को गोली गोली मार हुए थे शहीद

चंद्रशेखर आजाद की शहादत के बारे में कहा जाता है कि इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में 27 फरवरी, 1931 को जब उनका सामना अंग्रेजों से हुआ तो उन्होंने पहले पांच गोलियां अंग्रेजों पर चलाईं और फिर छठी गोली खुद को मार ली, क्योंकि चंद्रशेखर आजाद नहीं चाहते थे कि वो अंग्रेजों के हाथ लगें |

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अंग्रेज अफसर जॉन नॉट-बावर

चंद्रशेखर आजाद से मुठभेड़ करने वाले  अंग्रेज अफसर जॉन नॉट-बावर को अंग्रेजी सरकार ने आजाद की पिस्तौल गिफ्ट के तौर पर दी थी और उन्होंने उसे अपने घर में सजा कर रखा था | कहा जाता है कि उनके मन में ये भाव था कि उन्होंने भारत का बहुत बड़ा शेर मारा है |  साल 1972 में तत्कालीन केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार के साझा प्रयासों से ये पिस्तौल बावर से मंगवाई गई | इस पिस्तौल के भारत आने के 6 महीने बाद बावर की मौत हो गई |