कुछ दिनों पहले DK लिट्टी कार्नर पर जाना हुआ, साहब हम गए तो लिट्टी खाने पर लिट्टी के दाम में अनमोल ज्ञान और सीख ले आएं. DK लिट्टी की अर्श से फर्श तक पहुँचने वाली कहानी 90 के दशक की फिल्म से कम नहीं है. ‘रात को रात न समझ कर खटने वाला इंसान दूसरों की झूठन साफ़ करते-करते एक रोज़ मालिक बनकर दूसरों की जिंदगी संवार रहा है.’

डाकबंगला चौराहे से इनकम टैक्स की तरफ बढ़ते हुए हरी निवास की बिल्डिंग है. वहीं मारुती शोरूम के ठीक सामने लगता है बिहार के गौराव DK लिट्टी कार्नर का ठेला. आम बोलचाल की भाषा में ठेला कहें जाने वाला ये कार्नर दरअसल, बिहार की परंपरा का ध्वजवाहक है. विलुप्त होते जा रहे खाटी बिहारी स्वाद को वापस हर उम्र और तबके के लोगों की प्लेट तक पहुंचाने की उम्मीद से लिट्टी का ठेला लगाने दिनेश कुमार शाह उर्फ़ DK ने आज मौर्यालोक में बिहारी Aroma नाम का एक रेस्टोरेंट शुरू किया. DK लिट्टी कार्नर की फर्श से लेकर अर्श तक पहुँचने वाली कहानी दिलचस्प होने के साथ ही बेहद प्रेरणादायक भी है. मोटा-मोटी बोले तो छोटी चादर ओढ़े बड़े सपने देखने वालों के लिए सक्सेस मंत्र.

सफ़र की शुरुआत

सन् 1999 में घर की बदहाली से परेशान होकर दरभंगा जिले के उल्हत्ती गाँव के रहने वाले दिनेश कुमार शाह पटना भाग कर आएं. रोज़गार की तलाश में जब बोर्ड ऑफिस पहुंचे तो शिक्षा के अभाव में बर्तन धोने का काम मिला. दिनेश जी कहते हैं इस नौकरी से पेट तो भर रहा था पर मन में टीस थी कि कुछ बेहतर हो सकता है. कुछ समय बीतने के साथ ही दिनेश शाह की दोस्ती आसपास के झालमूरी बेचने वालों से हो गयी. नौकरी कर रहे DK को झालमूरी बेच रहे फकड़ों वाली जिंदगी ज्यादा बेहतर लगी. कुछ दिनों में बेसिक सीखकर दिनेश कुमार शाह उर्फ़ DK ने गले में टीना लटका कर गली-गली घूम कर झालमूरी बेचना शुरू कर दिया.

DK लिट्टी वाले दिनेश कुमार शाह
DK लिट्टी वाले दिनेश कुमार शाह

आमदनी बढ़ी थी, जीवन भी बेहतर हो गया था पर, सफ़र अभी भी बाकी था. दिनेश शाह ने नोटिस किया कि घूम-घूम कर झालमुरी बेचने वालों की आमदनी स्टाल लगाने वालों के मुकाबले कम है और मेहनत बहुत ज्यादा. इसलिए थोड़ा बहुत जुगाड़ करने के बाद उन्होंने भेलपुरी का स्टाल लगा लिया. और जल्द ही अपने दोस्त की मदद से झालमुरी के स्टाल को लिट्टी के स्टाल में बदल दिया.

क्या है आखिर DK लिट्टी में ख़ास

साल 2004 में दिनेश कुमार शाह ने अपने एक दोस्त के साथ DK लिट्टी कार्नर की शुरुआत की. मकसद बस इतना था कि गरीबों के नहीं बल्कि अमीरों की प्लेट में भी लिट्टी को जगह दिलाना. दिनेश कुमार बताते हैं कि सब लोग लिट्टी खाना पसंद नहीं करते थें क्योंकि अक्सर ये रोड के किनारे यूँ ही बिना साफ़-सफाई पर ध्यान दिए परोसी जाती थी. DK लिट्टी कार्नर की प्राथमिकता में है अपने कस्टमर को साफ़-सुथरे तरीके से बनायी गयी लिट्टी खिलाना. लिट्टी कार्नर के मालिक बताते हैं कि हर एक कारीगर साफ़-सफाई का पूरा ध्यान रखता है. साप्ताहिक मीटिंग के दौरान सबके बाल और नाखून कटे हैं कि नहीं इस पर भी ख़ास ध्यान दिया जाता है.

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साफ़-सफाई के अलावा DK लिट्टी की दूसरी सबसे ख़ास बात है लिट्टी बनाने की विधि. दरअसल, DK कार्नर की लिट्टी अन्य जगह या फिर कहें कि घर पर बनने वाली लिट्टी के मुकाबले बेहद मुलायम होती हैं. हेड कारीगर द्वारा बतायी जानकारी के अनुसार, लिट्टी के लिए आटे को पानी के बजाए दूध और पानी के गुनगुने मिश्रण से तैयार किया जाता है. साथ ही यहाँ कि लिट्टी के अनूठे स्वाद का श्रेय इमली के कोयले को जाता है. गोबर के गोयठे के बजाए इमली के कोयले पर तैयार होने ले कारण DK लिट्टी बेहद मुलायम होती है. दिनेश जी कहते हैं बाकि जगह मिलने वाली लिट्टी और उनके दुकान पर मिलने वाली लिट्टी में बस इतना फर्क की पूरा प्रोसेस बेहद ही लग्न और प्यार के साथ अंजाम तक ले जाया जाता है.

शुद्ध घी में बनी लिट्टी परोसते हैं DK
शुद्ध घी में बनी लिट्टी परोसते हैं DK

5 रूपए जोड़ा से शुरू होने वाले लिट्टी कार्नर में आज दो लिट्टी के लिए 25 रुपये देने होते हैं. इस छोटी सी रकम में मिलना वाला स्वाद अतुलनीय है. वैसे एक प्लेट में दो घी या बिना घी (जैसा आप चाहें) वाली लिट्टी के साथ बैंगन का चोखा, बादाम की चटनी, सरसों की चटनी और सलाद मिलता है.

अनूठा किस्सा

पटना के एक चौराहे में लगने वाले DK ठेले के स्वाद के मुरीद देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी रहते हैं. दिल्ली फ़ूड फेस्टिवल में भाग लेने के बाद दिनेश शाह को नेशनल फ़ूड एसोसिएशन ने साल 2015 में सिंगापुर भेजा. अपने गज़ब के स्वाद की बदौलत विदेशी लोगों से इतना प्यार मिला कि उनके पासपोर्ट ने वापस कभी अलमारी का मूंह ही नहीं देखा. शाह जी कहते हैं कि साल 2016 में फिलिपींस गए थें उसके बाद कोरना के कारण बाहर जाने का मौका नहीं मिला पर मन में इच्छा हैं कि दुनिया के अन्य देशों में भी बिहार के गौरव का डंका बजा सके.

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DK शाह बताते हैं कि एक बार पटना में फ़ूड फेस्टिवल का आयोजन किया गया था. DK लिट्टी कार्नर अपने शुरूआती दिनों में था. बड़ी मुश्किलों के बाद स्टाल मिला वो भी पाकिस्तान से आये मुगलाई कबाब और बिरयानी स्टाल के ठीक सामने. बाकि लोगों की तरह हमें भी लगा था कि मुर्गा छोड़ के कोई लिट्टी कहां खायेगा पर हमें ये बताते हुए इस बात पर बहुत गर्व है कि जितनी बिरयानी बिक रही थी उसके ही बराबर में लोग लिट्टी को चुन रहे थें.

आखिर रेस्टोरेंट क्यों ?

हर व्यक्ति बढ़ोतरी के सपने देखता है. सब अपनी मौजूदा स्थिति से आगे और बेहतर पाने की उम्मीद रखते हैं. यही कारण है कि DK लिट्टी कार्नर के मालिक दिनेश शाह ने बिहारी AROMA की शुरुआत की. दिनेश जी कहते हैं कि ठेले पर आने वाली महिलाओं और परिवारों को ख़ासा दिक्कतों का सामना करना पड़ता था. ऐसे में लोग आराम से बैठ कर मजेदार खाने का लुत्फ़ ले सके इसलिए रेस्टोरेंट की शुरुआत की गयी. इसके अलावा रेस्टोरेंट खोलने का जो दुसरा बड़ा कारण है कि ठेले पर भारी भीड़ इकठ्ठा होने के कारण कारीगर ZOMATO और SWIGGY के ऑर्डर्स पर ध्यान नहीं दे पाते थें,  जरुरी था कि ऑनलाइन ऑर्डर्स पर बराबर ध्यान दिया जाए. बिहारी Aroma खुलने के बाद से ऑनलाइन ऑर्डर्स की सारी जिम्मेदारी रेस्टोरेंट पर है.

DK लिट्टी कार्नर
DK लिट्टी कार्नर

बिहारी Aroma, मौर्यालोक में खुला छोटा सा रेस्टोरेंट जो बिहार के हर खोये स्वाद को वापस परोसने और संजोने की कोशिश में लगा है. यहाँ आपको अनेकों तरह की लिट्टी ( स्पेशल पनीर लिट्टी), चाइनीज, अनेक प्रकार की रोटियां, लस्सी और यहाँ तक विलुप्त होते जा रहे सामा चावल की खीर भी उपलब्ध है.

DK लिट्टी कार्नर के मालिक चाहते हैं कि वो दुनिया भर में लोगों को लिट्टी का दीवाना बना दें. इसके साथ उनका युवाओं के लिए सन्देश है कि मेहनत से कभी-भी पीछे न भागे.